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लव जिहाद पर कानूनी शिकंजा – यूपी में अध्यादेश

राज पाठक ।

लव जिहाद को लेकर देश व्यापी सियासी घमासान के बीच उत्तरप्रदेश ने विधि विरुद्ध “धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020” को मंजूरी दे दी । राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून का रूप ले लेगा, | जिसके बाद कथित लव जिहाद अपराध की श्रेणी में आएगा। इस कानून के तहत 10 साल की सजा का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद बीजेपी शासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, बिहार आदि राज्यों में ऐसा कानून लाने की तैयारी चल रही है।

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राज पाठक वरिष्ठ पत्रकार व लेखक दिल्ली।

उत्तर प्रदेश ‘धर्म सपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020’का उद्देश्य है कि जबरन, दबाव डालकर, लालच देकर, मिथ्या, बलपूर्वक या छल कपट से होने वाले धर्म परिवर्तनों को रोका जा सके। साथ ही, दूसरे धर्म में शादी करके किए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर अंकुश लगाया जा सके। झूठे नाम से शादी करना, नाम बदलकर, धर्म छुपाकर शादी करके धर्म परिवर्तन करना आदि को गैरकानूनी माना जाएगा।
अध्यादेश में प्रावधान है कि गुमराह करके, लालच देकर, झूठ बोलकर, जबरन या शादी करके धर्म परिवर्तन साबित होने पर 1 साल से लेकर 5 साल तक की सजा और ₹15000 जुर्माना लगेगा । मतलब महज शादी के लिए लड़की का धर्म बदला गया तो ना केवल शादी अमान्य होगी बल्कि धर्म परिवर्तन के दोषियों को सजा भी भुगतनी पड़ेगी । अध्यादेश में दूसरा प्रावधान है कि यदि अवयस्क महिला एससी /एसटी कैटेगरी से है और उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है तो 10 साल तक की सजा हो सकती है और ₹25000 जुर्माना लगेगा। सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामले में 3 से 10 साल तक की सजा और ₹50000 जुर्माना होगा ,संस्था यदि ऐसा कर आती है तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा।
अध्यादेश कहता है कि यदि कोई धर्म बदलना चाहता है तो उसे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को 2 महीने पहले आवेदन करना होगा, अनुमति मिलने पर धर्म परिवर्तन कर सकते हैं । बिना डीएम को आवेदन दिए कोई धर्म परिवर्तन करता है तो 6 मार्च से लेकर 3 साल तक की सजा और ₹10000 जुर्माने का प्रावधान है । पीडित के सगे संबंधियों की शिकायत पर कार्रवाई की जा सकती है। लव जिहाद जैसे मामले में मदद करने वालों को भी मुख्य आरोपी माना जाएगा ।
हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार शादी के लिए दोनों पक्षों का हिंदू होना जरूरी है,वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक दोनों पक्षों का मुस्लिम होना आवश्यक है ऐसे में वो लोग जो अलग-अलग धर्मों के हैं और शादी करना चाहते हैं तो उनके लिए विशेष विवाह अधिनियम है , जो उन्हें शादी करने की सुरक्षा प्रदान करता है । इसके लिए एक प्रक्रिया से गुजरना होता है। लेकिन ,विशेष विवाह अधिनियम शादी के लिए धर्म परिवर्तन की आवश्यकता को मंजूरी नहीं देता और ना ही इस अधिनियम में धर्म परिवर्तन के संबंध में दंड का विधान है ।अब ऐसे मामले में जहां धोखे में रखकर दूसरे धर्म में शादी की हो या धर्म परिवर्तन के लिए शादी की हो तो ऐसे मामले में विशेष दंड विधान या कानून का अभाव है इसलिए जब दुरुपयोग होता है या अपराध कारित होता है तो नए कानून या कानून में मॉडिफिकेशन आवश्यक हो जाता है।
असल में, भारतीय दंड विधान और भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में कानूनी प्रावधानों पर एक नजर डालना जरूरी है ।धोखा देकर शादी करने के मामले में आईपीसी की धारा 420 ,धोखा और विवाहके मामले को धारा 493 परिभाषित तो करती हैं और दंड की व्यवस्था भी करती है ,पर धोखा देकर विवाह और धर्म परिवर्तन के मामलों में दंडात्मक कार्यवाही के लिए धाराएं पर्याप्त नहीं मानी गई । धर्म छुपाकर या नाम बदलकर अलग धर्मों में विवाह करने के मामले मामलों के संबंध में कानूनों का अभाव है ।
दूसरी तरफ, इस अध्यादेश के विरोध में आवाज उठने लगी है, तर्क दिया जा रहा है कि सरकार उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप करने लगी है, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन है। इस तरह का कानून संविधान का उल्लंघन है, संविधान के मौलिक अधिकारों आर्टिकल 14 से 21 में देश के अंदर रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता, बिना भेदभाव समान अधिकारों के साथ रहने का अधिकार देता है। किसी भी प्रकार, किसी भी तरीके से किसी भी मनुष्य को भेदभाव की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है ,उसे बिना किसी को नुकसान पहुंचाए मर्जी से कार्य करने का अधिकार है। वहीं अनुच्छेद 25 ,26 ,27 और 28 में हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है ।
अनुच्छेद 25 में सभी को अपना धर्म मानने ,उसके प्रचार की आजादी है लेकिन यह हिदायत भी देता है कि धर्म प्रचार के अधिकार में किसी अन्य के धर्मांतरण का अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 26 – सभी संम्प्रदायों को धर्मिक कार्यक्रम करने का अधिकार देता है ।अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी धर्म विशेष को दान देने के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती । इस तरह एक अनुच्छेद 25, 26 ,27, 28 देश के हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता के आड़ में किसी दूसरे धर्म पर अतिक्रमण के लिए स्वतंत्र नहीं करता बल्कि सभी अपने -अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई किसी पर अपना धर्म थोप नहीं सकता और ना ही धर्म की आड़ में धोखा दे सकने के लिए स्वतंत्रता देता है।
इस संबंध में ,हाईकोर्ट के कुछ आदेशों का जिक्र करना जरूरी जान पड़ता है। हिंदू धर्म में प्रेम विवाह के एक मामले में हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि “सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन करना वैध नहीं है ।” संविधान ने भी यह व्यवस्था दी है कि दो अलग-अलग धर्मों को मानते हुए भी दो वयसाक एक साथ रह सकते हैं। दो वयस्क महिला-पुरुष शादी कर सकते हैं । धर्म परिवर्तन का दबाव नहीं डाला जा सकता है।
एक अन्य मामले नूरजहां बेगम और अंजली मिश्रा बनाम स्टेट ऑफ यूपी की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 16 दिसंबर 2014 को फैसला दिया। अदालत ने फैसले में कहा कि धर्म परिवर्तन के लिए उस धर्म में गहरी आस्था के साथ-साथ व्यक्तिगत विश्वास भी होना जरूरी है अगर कोई इस्लाम धर्म अपनाता है तो वह मर्जी से ऐसा करें । अगर मर्जी से इस्लाम धर्म में परिवर्तन ना हो और यह अपने मतलब के लिए किया जा रहा हो या किसी दावे या अधिकार के लिए हो रहा है तो वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं है । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि लड़की ने शादी के इरादे से धर्म बदला और वह इस्लाम के बारे में जानती तक नहीं है । साफ है कि लड़के ने शादी के इरादे से लड़की का धर्म परिवर्तन कराया । यह परिवर्तन बिना आस्था या सम्मान के केवल शादी के लिए था जो कि अवैध है।
हाल ही में कानपुर एसआईटी ने अपनी जांच में 11 ऐसे मामलों का खुलासा किया था जिसमें हिंदू लड़कियों को धोखाधड़ी से, नाम छुपा कर और उनका धर्म परिवर्तन करवा कर विवाह किया गया था। एसआईटी ने जो जांच रिपोर्ट सौंपी उसमें कुछ बातें चौंकाने वाली थी। आरोपियों ने नाम बदलकर और अपना धर्म छुपा कर हिंदू लड़कियों से प्रेम किया बाद में लड़की का धर्म बदलवा कर शादी की -जैसे फतेह खान ने आर्यन मल्होत्रा बनकर धोखा दिया ,मो. ओवैश ने बाबू बनकर और मुख्तार अहमद ने राहुल बनकर धोखे से हिंदू लड़कियों के साथ शादी की । जांच में यह भी पाया गया कि आरोपी खुद को हिंदू साबित करने के लिए मंदिर में जाता ,तिलक लगाने और हाथों में धागा बांधने का भी ढोंग करता था । ऐसी धोखाधड़ी की स्वतंत्रता ना तो संविधान देता है और ना ही कानून। इस तरह के अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए विशेष कानून बनाने की मांग ने जोर पकड़ा और बीजेपी ने इसे लपक लिया ,जमकर मुद्दा बनाया और फिर बीजेपी की उत्तर प्रदेश सरकार ने अध्यादेश पारित किया
लव जिहाद शब्द को कानून या संविधान या किसी भी भाषा ने परिभाषित नहीं किया है । यह सियासी रूप से गढ़ा गया शब्द है ।भाषा विज्ञान के जानकार इसे किसी भाषा का शब्द नहीं मानते । विशेष वर्ग,विशेष धर्म को उद्वेलित करने के लिए लव जिहाद जैसे शब्दों को उछाला जाता है । राजनीतिक लाभ के लिए लव जिहाद को जितना उछालेगे उतना फलेगा- फूलेगा ।
धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 यदि कानून बन जाता है तो उत्तर प्रदेश में लागू हो जाएगा । इस कानून की सीमा है, यह कानून राज्य की सीमा के बाहर लागू नहीं होगा। सीमितता यह भी है कि इस तरह के विवाह दूसरे राज्यों में जाकर किए जा सकते हैं जहां यह कानून नहीं है । विधि जानकारों का मानना है कि इस तरह के अपराधों से पूर्णरूपेण निपटने के लिए देशव्यापी केंद्रीय कानून की जरूरत है।

राज पाठक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं.

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