मध्य प्रदेश में नरेंद्र मोदी के कारण चूक गए शिवराज सिंह चौहान?

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वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह ने मंगलवार की शाम चुनावी नतीजे आने के बाद हार स्वीकार करते हुए इस्तीफ़े की घोषणा कर दी थी. इंतज़ार था 13 सालों से मध्य प्रदेश की सत्ता पर क़ाबिज़ शिवराज सिंह चौहान का.

मध्य प्रदेश की मतगणना 12 दिसंबर की सुबह आठ बजे तक चली. पूरी रात ऐसा लगता रहा कि कहीं बड़ा उलटफेर ना हो जाए. सवा आठ बजे स्थिति साफ़ हो गई. किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस और बीजेपी के बीच महज़ पांच सीटों का फ़र्क रहा.

ऐसा लग रहा था कि बीजेपी इतनी जल्दी हार नहीं मानेगी और सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है. मंगलवार की रात बीजेपी के मध्य प्रदेश प्रमुख राकेश सिंह ने एक ट्वीट कर इन क़यासों को और हवा दी. राकेश सिंह ने ट्वीट किया कि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है और बीजेपी निर्दलीय विधायकों के संपर्क में है.

लेकिन दिक़्क़त ये थी कि सारे निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिलने के बाद भी बीजेपी बहुमत के जादुई आँकड़ों तक नहीं पहुंच पा रही थी. बीजेपी के 109 और चार निर्दलीय विधायकों को मिलाने के बाद भी संख्या 113 तक ही पहुंच पाती.

मायावती ने अपने दो विधायकों और समाजवादी पार्टी ने एक विधायक का समर्थन कांग्रेस को देने की घोषणा कर दी थी. ऐसे में शिवराज सिंह चौहान के पास कोई विकल्प नहीं बचा था.
सारे विकल्पों को देख चौहान बुधवार ग्यारह बजे दिन में मीडिया के सामने आए और कहा, ”किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. बीजेपी को कांग्रेस से ज़्यादा वोट मिले लेकिन संख्या बल में हम पिछड़ गए. मैं संख्या बल के सामने सिर झुकाता हूं और अब मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने जा रहा हूं.”

शिवराज सिंह चौहान लगातार 13 सालों से ज़्यादा वक़्त तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इतने सालों तक मध्य प्रदेश की कमान किसी और के पास नहीं रही.

इस बार भी बीजेपी को उम्मीद थी कि शिवराज सिंह चौहान का नेतृत्व कांग्रेस पर भारी पड़ेगा और बीजेपी लगातार चौथी बार सत्ता में आएगी. इस बात को लगभग सभी लोग मानते हैं कि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के क़द का कांग्रेस में कोई नेता नहीं था. इतना कुछ होने के बावजूद भी आख़िर चौहान कहां चूक गए?

ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार राम विद्रोही का मानना है कि मध्य प्रदेश में यह चौहान की चूक नहीं है बल्कि यह जनादेश केंद्र सरकार की नोटबंदी और ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ है.

विद्रोही कहते हैं, ”नतीजे आने के बाद मैंने कई गांव वालों से बात की. किसी ने शिवराज सिंह चौहान की बुराई नहीं की. सबने चौहान की तारीफ़ की और कहा कि नोटबंदी के कारण उनका नुक़सान हुआ है. नोटबंदी से आम लोग प्रभावित हुए हैं और जीएसटी से मध्य वर्ग. शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व के कारण ही बीजेपी को कांग्रेस से भी ज़्यादा वोट मिले. हम कह सकते हैं कि यह जनादेश शिवराज के चुनाव में मोदी के ख़िलाफ़ है.”
शिवराज सिंह चौहान के 13 सालों के शासन के ख़िलाफ़ लोगों में ग़ुस्सा होता तो दोनों पार्टियों में जीत का फ़र्क महज़ पाँच सीटों का नहीं होता.

मध्य प्रदेश के कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी भी इस बात से सहमत हैं कि लोगों में शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ उस तरह से नाराज़गी नहीं थी जैसी नाराज़गी मोदी सरकार और उसकी नीतियों से थी.

हालांकि बीजेपी ऐसा नहीं मानती है. बीजेपी का कहना है कि राज्य में जनादेश वहां की सरकार के पक्ष या ख़िलाफ़ में होता है और यह केंद्र की सरकार के आधार पर नहीं है.

बीजेपी प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ”यह केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जनादेश नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार के ख़िलाफ़ भी नहीं है. हमने कांग्रेस से ज़्यादा वोट हासिल किए हैं. जहां तक सीटें कम होने की बात है तो हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं. कहीं न कहीं तो हमारी चूक हुई है.”

मध्य प्रदेश में चुनाव के दौरान लोगों से बात करते हुए शिवराज सिंह के प्रति उनकी सहानुभूति छिपती नहीं थी. लोग उनके मंत्रियों की आलोचना करते थे, केंद्र सरकार की आलोचना करते थे लेकिन चौहान से सहानुभूति जताते थे. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने लोकसभा क्षेत्र विदिशा में जिस अजनास गांव को गोद लिया वहां के सुरेश व्यास भी उन्हीं लोगों में से हैं.

वो केंद्र सरकार और अपनी सांसद सुषमा के ख़िलाफ़ तो ग़ुस्सा दिखाते हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान से सहानुभूति जताते हुए कहते हैं, ”वो तो बहुत अच्छे हैं. उन्होंने ही तो कुछ किया है.”

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ”मैं भी इस बात से सहमत हूं कि यह जनादेश शिवराज के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मोदी के ख़िलाफ़ है. अगर शिवराज के ख़िलाफ़ होता तो बीजेपी बुरी तरह से हारती. शिवराज प्रदेश में काफ़ी लोकप्रिय थे और उनकी लोकप्रियता में उस तरह से कोई कमी नहीं आई थी.”
हरदेनिया कहते हैं, ”शिवराज सिंह के ख़िलाफ़ जो बातें जाती हैं वो पार्टी के भीतर भी कई बार दिख जाती थी. पार्टी के सीनियर नेता रघुनंदन शर्मा तो चौहान को घोषणावीर कहते थे. बीजेपी में घमंड का बढ़ना भी एक समस्या थी. एबीवीपी के लोगों ने प्रोफ़ेसर की हत्या कर दी थी. हाल ही में एक प्रोफ़ेसर के मुंह पर कालिख पोत दी थी. ये सब ऐसी चीज़ें हैं जिनसे शिवराज की छवि एक अप्रभावी शासक के तौर पर भी बनी. लेकिन इसके साथ ही एक रुपए किलो गेहूं देना और सामूहिक शादियां जैसे प्रोग्राम काफ़ी हिट रहे.”

मध्य प्रदेश में किसानों पर शिवराज सिंह चौहान के शासन काल में गोलियां चलीं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिन बाद ही क़र्ज़ माफ़ी का वादा कर दिया था.

शिवराज सिंह चौहान जीतकर भी हार गए
शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुई. 1988 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने. 1990 में पहली बार बीजेपी ने चौहान को बुधनी से विधानसभा चुनाव में खड़ा किया. चौहान ने पूरे इलाक़े की पदयात्रा की थी और पहला ही चुनाव जीतने में सफल रहे. तब चौहान की उम्र महज़ 31 साल थी.

1991 में 10वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी इस चुनाव में दो जगह से खड़े थे. एक उत्तर प्रदेश के लखनऊ और दूसरा मध्य प्रदेश के विदिशा से. वाजपेयी को दोनों जगह से जीत मिली. उन्होंने लखनऊ को चुना और विदिशा को छोड़ दिया. सुंदरलाल पटवा ने विदिशा के उपचुनाव में शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का प्रत्याशी बनाया और वो पहली बार में ही चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए.